Monday, 24 November 2025

बूँदें



 कुछ बूँदें यूँ ही ठहर जाती है शीशों पर अक्सर ही और सब धुंधला सा नज़र आता है।

बचपन के रंग

बचपन में जब रंगों से पहला सरोकार हुआ था तो फूले न समाते थे। कॉपियों से लेकर दीवारों तक, मेज-कुर्सियों से लेकर कपड़ों तक, सब रंगों में रंग देना चाहते थे। संसार एक कैनवास मात्र था, जो रंगने के लिए हमें पुकार रहा था और हम संसार की उस पुकार को अनसुना भी न करते थे। 

उन आड़े-टेढ़े, बेढंग चित्रों में विशुद्ध आनंद की अनुभूति थी। न सीमा लाँघकर बाहर रंग देने की चिंता, न आकार-विकार की समझ, न ही सौंदर्य के मापदंडों का ज्ञान और न इनाम पाने की अपेक्षा, उस विशुद्ध आनंद को छू सकती थी। बल्कि दीवारों पर चित्र बनाकर पड़ने वाली मार भी, उस रंग-विभोर आनंद की लालसा से विमुख न होने देती थी।

मैं आज भी चित्र बनाती हूँ, मगर बनाने से पहले ही कई चिंताएँ घेर लेती हैं; जैसे - क्या बनाऊँ?, क्या यह सुंदर दिखेगा? क्या मैं इसे बना पाऊँगी? चित्र बनाने पर एक चेतावनी धीरे से कंधे पर हाथ रख देती है और कहती है," देखो, रंग सीमा से बाहर न जाए।" और बन जाने पर तुलना भी कर ही देती हूँ कि शायद उतना अच्छा नहीं बना। इस सब के बीच वो रंगों का आनंद और अनुभूति दूर कहीं माथा पकड़े बैठे रहते हैं। आख़िर उस विशु‌द्ध आनंद में चिंता, अपेक्षा, टेक्नीक और एस्थेटिक्स की मिलावट हो ही गई और हमें आभास भी नहीं हुआ।

पानी का बँटवारा


अगर पढ़ भी लें उन तहरीरों को, तो क्या समझ पाएंगें कभी मुकम्मिल तौर पर?
कि वो कहते हैं कि उसमे पानी बस आधा तुम्हारा है, और आधा है हमारा।

 

Window

  I have a deep fascination with windows which has only grown with time. I have captured them at various places, in various shades, angles, ...