Thursday, 25 December 2025

कुछ नया, कुछ पुराना

मकान बना रहा हूँ नया, 
पुराना तोड़कर 
जगह कम थी, 
विस्तार चाहता हूँ। 
नया रूप, नया रंग, 
कुछ नया आकार चाहता हूँ ।
पुराना टूटा तो कुछ ईंटें निकल आई साबुत,
और कुछ लोहे के सरीयें बेज़ंग,
बारिश, धूप और हवा से बेअसर। 
सोचता हूँ, इन्हें फिर लगवा दूँ  
नयी इंटों और सरीयों के साथ 
ताकि मकान बने एक, 
कुछ नया, कुछ पुराना सा।


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